गीत

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सरगमीं प्यास को अपनी मैं बुझा लूँ तो चलूँ

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सरगमीं प्यास को अपनी मैं बुझा लूँ तो चलूँ ,

तुम को दिल में आहिस्ता से सजा लूँ तो चलूँ ……

भीनी यादों को यूँ संजोया है ,

बीज जन्नत का मैंने बोया है,

मन मेरा बस रहा इन गीतों में ,

ख़ुद को आईना, मैं दिखा लूँ तो चलूँ ||

सरगमीं प्यास को अपनी मैं बुझा लूँ तो चलूँ ……..२


दिल की आवाज़ यूं सहेजी है,

मस्त मौसम में अश्रु छलके हैं,

गम की बूँदों को रखा सीपी में ,

शब्द मुक्तक मैं उठा लूँ तो चलूँ ||


सरगमीं प्यास को अपनी मैं बुझा लूँ तो चलूँ ,

तुम को दिल में आहिस्ता से सजा लूँ तो चलूँ ……

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दिल की चाहत

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इस कदर तुम तो अपने करीब गए ,

कि तुम से बिछड़ना गवारां नहीं |

ऐसे बांधा मुझे अपने आगोश में ,

कि ख़ुद को अभी तक संवारा नहीं ||


अपनी खुशबू से मदहोश करता मुझे ,

दूसरा कोई ऐसा नज़ारा नहीं |

दिल की दुनिया में तुझको लिया है बसा,

तुम जितना मुझे कोई प्यारा नहीं ||


दिल पे मरहम हमेशा लगाते रहे ,

आफतों में भी मुझको पुकारा नहीं |

अपना सब कुछ तो तुमने है मुझको दिया,

रहा दिल तक तो अब ये हमारा नहीं ||


मसफ़र तुम हमारे हमेशा बने ,

इस ज़माने का कोई सहारा नही |

साथ देते रहो तुम मेरा सदा,

मिलता ऐसा जनम फिर दुबारा नहीं ||

रचयिता ,
अम्बरीष श्रीवास्तववास्तुशिल्प अभियंता
91,
सिविल लाइंस सीतापुर , उत्तर प्रदेश , इंडिया ( भारतवर्ष ),

ईमेल: kaviambarish@gmail.com

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, मोबाइल : +919415047020

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