कवि अम्बरीष श्रीवास्तव “वास्तुशिल्प अभियंता” का संक्षिप्त परिचय

Posted on 20/04/2009. Filed under: Uncategorized |

“कवि का निर्माण विश्व के किसी भी प्रशिक्षण संस्थान में नहीं होता क्योंकि कविता तो प्रकृति का वरदान है और अभ्यास करते करते व्यक्ति कवि बन जाता है।”

बहुमुखी प्रतिभा के धनी एवं कर्मयोगी कवि अम्बरीष श्रीवास्तव जनपद सीतापुर के एक प्रख्यात वास्तुशिल्प अभियंता एवं मूल्यांकक होने के साथ साथ  एक राष्ट्रवादी  विचारधारा के कवि हैं | जिस समर्पित भावना से वे एक सुन्दर, उपयोगी व् टिकाऊ भवन को डिजायन करते है ठीक उसी तरह की भावना से वे काव्य सृजन  में निरंतर अनुरत हैं | कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं जैसे “स्वर्गविभा.टी के “, “साहित्य-वैभव.कॉम “, “काव्य.इन्फो” , “हिन्दी-मीडिया.इन” , “विकिपीडिया राम भजन संग्रह”, “चिट्ठाजगत.इन”  तथा ब्लॉग आदि पर उनकी अनेकों रचनाएँ प्रकाशित हैं, उनकी रचनाओं के गुणवत्ता के परिणामस्वरूप उन्हें राष्ट्रीय कवि संगम वेब् साईट पर भी स्थान दिया गया है |

एक कविता के माध्यम से वे प्रभु राम से प्रार्थना करते हैं ——

“मोक्ष-वोक्ष” कुछ मैं ना माँगूं , ‘कर्मयोग’ तुम देना,

जब भी जग में मैं गिर जाऊँ मुझको अपना लेना,

कृष्ण और साईं रूप तुम्हारे, करते जग कल्याण

कैसे करुँ वंदना तेरी , दे दो मुझको ज्ञान

जय-जय राम सीताराम, जय-जय राम सीताराम….”

ambarish-srivastava1

अम्बरीष श्रीवास्तव का जन्म ३०, जून सन १९६५ को भारतवर्ष स्थित उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के “सरैया-कायस्थान” गाँव में हुआ था | बचपन में ग्रामीण परिवेश में शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंनें अपनी अंतिम तकनीकी शिक्षा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर से प्राप्त की | वर्तमान में वे भारतीय भवन अभिकल्पक संघ संस्थान के अध्यक्ष है  तथा उन्हें देश विदेश के कई प्रतिष्ठित तकनीकी व्यावसायिक संस्थानों जैसे अमेरिकन सोसायटी आफ सिविल इंजीनियर्स ( यू ० एस ० ए ० ) , भारतीय पुल अभियंता संस्थान, भारतीय भवन कांग्रेस, भारतीय सड़क कांग्रेस, भारतीय तकनीकी शिक्षा समिति, भारतीय गुणवत्ता वृत्त फॉरम, भारतीय भवन अभिकल्पक संघ संस्थान,  भारतीय उद्योग संस्थान, भारतीय मानवाधिकार संघ,  आर्किटेक्चरल इंजीनियरिंग संस्थान ( यू ० एस ० ए ० ) तथा  संरचनात्मक इंजीनियरिंग संस्थान ( यू ० एस ० ए ० ) आदि की सदस्यता  प्राप्त है | साथ- साथ वे “हिन्दी साहित्य परिषद्” व “साहित्य उत्थान परिषद्” सीतापुर के सदस्य तथा “हिन्दी सभा ” सीतापुर के आजीवन सदस्य भी हैं | अपनी माता श्रीमती मिथलेश श्रीवास्तव एवं पिता श्री राम कुमार श्रीवास्तव के आशीर्वाद व वरद-हस्त  के फलस्वरूप वर्ष २००७ में उनको स्वयं के वास्तुशिल्प अभियंत्रण कार्य क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवा योगदान, व प्राप्त उपलब्धियों हेतु राष्ट्रीय अवार्ड इंदिरा गाँधी प्रियदर्शनी अवार्ड से विभूषित किया गया है, इसके अतिरिक्त वे  अनेकों उपाधियों यथा “सरस्वती रत्न”, “अभियंत्रण श्री” आदि से भी विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किये गए हैं | वर्तमान में वे सीतापुर में वास्तुशिल्प अभियंता के रूप में स्वतंत्र रूप से जन सामान्य को अपनी सेवाएं दे रहे हैं तथा वे कई राष्ट्रीयकृत बैंकों व कंपनियों में मूल्यांकक  के रूप में सूचीबद्ध होकर कार्य कर रहे हैं | लोकोपयोगी होने के कारण उनकी रचनाएँ दीर्घकाल तक स्थाई रहेंगीं |


माँ की महिमा

नैनन में है जल भरा,  आँचल  में  आशीष |
तुम सा दूजा नहि यहाँ , तुम्हें नवायें शीश ||

कंटक सा संसार है, कहीं   न  टिकता  पांव |
अपनापन मिलता नहीं , माँ के सिवा न ठांव ||

रहीं लहू से सींचती, काया तेरी देन |
संस्कार सारे दिए, अदभुद तेरा प्रेम  ||

रातों को भी जागकर,   हमें  लिया है पाल |
ऋण तेरा  कैसे  चुके,    सोंचे    तेरे  लाल ||

स्वारथ  है  कोई  नहीं ,  ना    कोई     व्यापार |
माँ  का अनुपम प्रेम   है,. शीतल सुखद  बयार ||

जननी को जो पूजता , जग पूजै है सोय |
महिमा वर्णन कर सके, जग में दिखै न कोय ||

माँ तो जग का मूल है, माँ  में बसता प्यार |
मातृ-दिवस पर पूजता, तुझको  सब संसार ||

रचयिता:
अम्बरीष श्रीवास्तव ” वास्तुशिल्प अभियंता”
९१, आगा  कालोनी, सिविल लाइंस सीतापुर २६१००१ (उत्तर प्रदेश )
भारतवर्ष
फ़ोन : +९१ ५८६२ २४४४४०
मोबाइल +९१ ९४१५०४७०२०



कविता

कविता को साहित्यिक अभिव्यक्ति का सबसे पुराना रूप माना जाता है. विद्वानों ने कई तरह से उसे समझने और परिभाषा में बाँधने का प्रयत्न किया है. लेकिन कविता की शक्ति अनुभव की आँच होती है जो परिभाषाओं के ढाँचे को पिघला देती है. काव्यत्व के लिए पद्य का ढाँचा अनिवार्य नहीं है. काव्यत्व गद्य में भी हो सकता है. लेकिन पद्य कहने से सामान्यत: कविता का बोध होता है. पद्य लय का अनुशासनबद्ध पारिभाषिक रूप है. गद्य में लय का यह पारिभाषिक रूप नहीं होता, लेकिन गद्य में भी जब लय के संवेदन प्रभावी होकर उभरते हैं तो उसमें काव्यत्व आ जाता है. फिर भी उसे कविता नहीं कहा जा सकता. उसके लिए गद्य काव्य जैसे संयुक्त पद का व्यवहार होता है. इससे पता चलता है कि काव्य उसकी संज्ञा नहीं विशेषण है, विधा के स्तर पर वह है गद्य ही. कविता, पद्य की जाति या वंश परंपरा की रचना है. इसीलिए पद्य कहने से कविता का ही बोध होता है.

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है:

कविता का लोकप्रचलित अर्थ वह वाक्य है जिसमें भावावेग हो, कल्पना हो, पद लालित्य हो और प्रयोजन की सीमा समाप्त हो चुकी हो. प्रयोजन की सीमा समाप्त हो जाने पर अलौकिक रस का साक्षात्कार होता है.

उन्होंने आगे लिखा है:

वस्तुत: अलौकिक शब्द का व्यवहार हम इसलिए नहीं करते कि वह इस लोक में न पाई जानेवाली किसी वस्तु का द्योतक है बल्कि इसलिए करते हैं कि लोक में जो एक नपी-तुली सचाई की पैमाइश है उससे काव्यगत आनंद को नापा नहीं जा सकता.

किन्तु हमारे प्राचीन शास्त्रकारों ने काव्यगत आनंद की व्याख्या और काव्य के स्वरूप को नापने का प्रयत्न किया है. भारतीय काव्यशास्त्र की विशेषता यह है कि उसमें काव्य की आत्मा जानने की मुख्य चिंता है. अलंकारशास्त्र यदि चमत्कार को काव्य की आत्मा मानता है तो ध्वनिशास्त्र ध्वनि को. रीति और वक्रोक्ति सिद्धांत काव्य की आत्मा रीति और वक्रोक्ति को मानते हैं. किन्तु ध्वनि और रस को भारतीय मनीषा ने व्यापक मान्यता प्रदान की. साहित्य दर्पण के लेखक आचार्य विश्वनाथ तक आते-आते तो काव्य की आत्मा के रूप में रस की प्रतिष्ठा निर्विवाद हो गई. सर्वोत्त्म कविता का आदर्श उसे माना गया जिसमें रस ध्वनित हो.

आधुनिक युग के आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कविता की परिभाषा इस प्रकार की है:

जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है. हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मुनष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं.

कविता के तत्त्वों के भाव, बुद्धि, कल्पना और शैली का उल्लेख किया जाता है. किन्तु ये तत्त्व साहित्य मात्र की विशेषता को व्यक्त करते हैं.
कविता की आत्मा और उसके तत्त्वों की चिंता न करके उसे साहित्य की विशेष विधा के रूप में समझने की कोशिश हमारे लिए ज्यादा काम की चीज़ हो सकती है. कविता के पाठक के सामने काव्य की लंबी परम्परा ज़रूर रहती है. इस परम्परा-संबंध से काव्य की विशेष योग्यता को पहचानने में बहुत कठिनाई नहीं होती. काव्य की छंदबद्धता या लय की चर्चा ऊपर हो चुकी है. यदि कथा साहित्य को सामने रखकर हम कविता को पहचानना चाहें तो लगेगा कि कविता उन बहुत से विवरणों को छोड़ देती है जो कथा साहित्य के लिए आवश्यक हैं. कविता उतने ही विवरणों को काम में लाती है जिनसे भाव और अनुभव का स्वरूप उभर जाये. यानी कविता में जीवन और परिस्थितियों के विवरणों का चुनाव अचूक और गहनतर होता है.

कविता की बहुत बड़ी विशेषता यह है कि वह भाव का बिम्ब ग्रहण कराती है. उदाहरण के लिए:

किसी ने कहा, कमल! अब इस कमल पद का ग्रहण कोई इस प्रकार भी कर सकता है कि ललाई लिए हुए सफेद पंखड़ियों और झुके हुए नाल आदि सहित एक फूल की मूर्ति मन में थोड़ी देर के लिए आ जाये या कुछ देर बनी रहे, और इस प्रकार भी कर सकता है कि कोई चित्र उपस्थित न हो, केवल पद का अर्थ मात्र समझ कर काम चला लिया जाए. … बिम्ब ग्रहण वहीं होता है जहाँ कवि अपने सूक्ष्म निरीक्षण द्वारा वस्तुओं के अंग प्रत्यंग, वर्ण आकृति तथा उसके आस पास की परिस्थिति का परस्पर संश्लिष्ट विवरण देता है.

इस प्रकार कविता भाव को बिम्ब या चित्र रूप में धारण करती है.

कविता जीवन और वस्तुओं के भीतर किन्हीं मार्मिक तथ्यों को चुन लेती है. कल्पना के सहारे उन तथ्यों की मार्मिकता को सघन और प्रभावी रूप में चित्रित करती है. उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को अपनी पत्नी पर अत्याचार करते हुए देखकर कोई दूसरा कहे कि, “तुमने इसका हाथ थामा है.” तो वह एक मार्मिक बिन्दु पर इस तथ्य को पकड़ लेता है. क्योंकि पत्नी को सहारा देना पति का कर्त्तव्य है न कि उस पर अत्याचार करना. यदि वह यह कहता कि, “तुमने इससे विवाह किया है.” तो इस वाक्य में अनेक शास्त्र मर्यादायें और विधियाँ हैं. इसमें अनेक तथ्य शामिल हैं और उनमें से किस तथ्य में कितनी मार्मिकता है, उसका स्पष्टीकरण नहीं होता. लेकिन हाथ थामनेमें तथ्य स्पष्ट है और वह मार्मिक इसलिए हो जाता है कि जिसे सहारा देना चाहिए उस पर अत्याचार किया जा रहा है.

कविता की विशेषता नाद-सौन्दर्य के उपयोग में भी है. “नाद-सौन्दर्य से कविता की आयु बढ़ती है.” वह बहुत दिनों तक याद रहती है.

__________________________________प्रो. नित्यानंद तिवारी, से साभार


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